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मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )




हर सुबह  रंगीन   अपनी  शाम  हर  मदहोश है
वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला

चार पल की जिंदगी में ,मिल गयी सदियों की दौलत
जब मिल गयी नजरें हमारी ,दिल से दिल अपना मिला

नाज अपनी जिंदगी पर ,क्यों न हो हमको भला
कई मुद्द्दतों के बाद फिर  अरमानों का पत्ता हिला

इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर
रफ्ता रफ्ता ढह गया, तन्हाई का अपना किला

वक़्त भी कुछ इस तरह से आज अपने साथ है
चाँद सूरज फूल में बस यार का चेहरा मिला

दर्द मिलने पर शिकायत ,क्यों भला करते मदन
 दर्द को देखा जो   दिल में मुस्कराते ही मिला


ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )

मदन मोहन सक्सेना

बुधवार, 23 मार्च 2016

ग़ज़ल (होली )



 ग़ज़ल (होली )

मन से मन भी मिल जाये , तन से तन भी मिल जाये
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

मौसम आज रंगों का छायी अब खुमारी है
चलों सब एक रंग में हो कि आयी आज होली है

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली है

क्या जीजा हों कि साली हों ,देवर हो या भाभी हो
दिखे रंगनें में रंगानें में , सभी मशगूल होली है

ना शिकबा अब रहे कोई , ना ही दुश्मनी पनपे
गले अब मिल भी जाओं सब, आयी आज होली है

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .


ग़ज़ल (होली )

मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 7 मार्च 2016

ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल)







ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल)

कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना
जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ,ना खुशबु ही बिखर पाये
हालत देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों
पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है
टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों
भूले से भी मेहमाँ को नहीं घर में टिकाते हैं

अब सन्नाटे के घेरे में ,जरुरत भर ही आबाजें
घर में ,दिल की बात दिल में ही यारों अब दबातें हैं


मदन मोहन सक्सेना

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

गज़ल ( अहसास)







गज़ल ( अहसास)

ऐसे कुछ अहसास होते हैं हर इंसान के जीवन में 
भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं 

जो दिल कि बात सुनता है बही दिलदार है यारों 
दौलत बान अक्सर तो असल में दास होते हैं 

अपनापन लगे जिससे बही तो यार अपना है 
आजकल  तो स्वार्थ सिद्धि में रिश्ते नाश होते हैं

धर्म अब आज रुपया है ,कर्मअब आज रुपया है
जीवन केखजानें अब,  क्यों सत्यानाश होते हैं 

समय रहते अगर चेते तभी तो बात बनती है
बरना नरक है जीबन , पीढ़ियों में त्रास होते हैं



गज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना




बुधवार, 27 जनवरी 2016

ग़ज़ल (अजब गजब सँसार )


अब जीना दुश्बार हुआ 
अज़ब गज़ब सँसार हुआ

रिश्तें नातें प्यार बफ़ा से 
सबको अब इन्कार  हुआ 

बंगला ,गाड़ी ,बैंक तिजोरी 
इनसे सबको प्यार हुआ 

जिनकी ज़िम्मेदारी घर की
वह सात समुन्द्र पार हुआ 

इक घर में दस दस घर देखें 
अज़ब गज़ब सँसार हुआ

मिलने की है आशा  जिससे
उस से  सब को प्यार हुआ 

ब्यस्त  हुए तव  बेटे बेटी
मदन "बूढ़ा  " जब वीमार हुआ 


ग़ज़ल (अजब गजब सँसार )

मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 23 नवंबर 2015

ग़ज़ल (वक़्त की रफ़्तार)


ग़ज़ल (वक़्त की रफ़्तार)
 
वक़्त की रफ़्तार का कुछ भी भरोसा है नहीं
कल तलक था जो सुहाना कल वही  विकराल हो

इस तरह से आज पग में फूल से कांटे चुभे हैं
चाँदनी  से खौफ लगता ज्यों कालिमा का जाल हो

ये किसी की बदनसीबी गर नहीं तो और क्या है
याद आने पर  किसी का हाल जब बदहाल हो

जो पास रहकर दूर हैं  और दूर रहकर पास हैं
करते  गुजारिश हैं खुदा से,  मौत अब तत्काल हो

चंद लम्हों की धरोहर आज अपने पास है बस
ब्यर्थ से लगते मदन अब मास हो या साल हो


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)






ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)

बदलते बक्त में मुझको दिखे बदले हुए चेहरे
माँ का एक सा चेहरा , मेरे मन में पसर जाता

नहीं देखा खुदा को है ना ईश्वर से मिला मैं हुँ
मुझे माँ के ही चेहरे मेँ खुदा यारों नजर आता

मुश्किल से निकल आता, करता याद जब माँ को
माँ कितनी दूर हो फ़िर भी दुआओं में असर आता

उम्र गुजरी ,जहाँ देखा, लिया है स्वाद बहुतेरा
माँ के हाथ का खाना ही मेरे मन में उतर पाता

खुदा तो आ नहीं सकता ,हर एक के तो बचपन में
माँ की पूज ममता से अपना जीबन , ये संभर जाता

जो माँ की कद्र ना करते ,नहीं अहसास उनको है
क्या खोया है जीबन में, समय उनका ठहर जाता

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)
 

मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

दुआओं का असर होता दुआ से काम लेता हूँ

 























हुआ इलाज भी मुश्किल ,नहीं मिलती दबा असली
दुआओं का असर होता दुआ से काम लेता हूँ


मुझे फुर्सत नहीं यारों कि माथा टेकुं दर दर पे
अगर कोई डगमगाता है उसे मैं थाम लेता हूँ


खुदा का नाम लेने में क्यों मुझसे देर हो जाती
खुदा का नाम से पहले ,मैं उनका नाम लेता हूँ


मुझे इच्छा नहीं यारों कि  मेरे पास दौलत हो
सुकून हो चैन हो दिल को इसी से काम लेता हूँ


सब कुछ तो बिका करता मजबूरी के आलम में
मैं सांसों के जनाज़े को सुबह से शाम लेता हूँ


सांसे है तो जीवन है तभी है मूल्य मेहनत का
जितना हो  जरुरी बस उसी का दाम लेता हूँ


 मदन मोहन सक्सेना



बुधवार, 16 सितंबर 2015

ग़ज़ल ( प्यारे पापा डैड हो गए )






माता मम्मी अम्मा कहकर बच्चे प्यार जताते थे

मम्मी अब तो ममी हो गयीं प्यारे पापा डैड हो गए

पिज्जा बर्गर कोक भा गया नए ज़माने के लोगों को
दही जलेबी हलुआ पूड़ी सब के सब क्यों  बैड हो गए

गौशाला में गाय नहीं है ,दिखती अब चौराहों में
घर घर कुत्ते राज कर रहें  मालिक उनके मैड हो गए

कैसे कैसे गीत  हुये अब शोरनुमा संगीत हुये अब
देख दशा और रंग ढंग क्यों तानसेन भी सैड हो गए

दादी बाबा मम्मी पापा चुप चुप घर में रहतें हैं
नए दौर में बच्चे ही अब घर के मानों हैड हो गए ।



मदन मोहन सक्सेना

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

ग़ज़ल (कुर्सी और वोट)

ग़ज़ल (कुर्सी और वोट)




कुर्सी और वोट की खातिर काट काट के सूबे बनते

नेताओं के जाने कैसे कैसे , अब ब्यबहार हुए
 

दिल्ली में कोई भूखा बैठा, कोई अनशन पर बैठ गया
भूख किसे कहतें हैं नेता उससे अब दो चार हुए

 

नेता क्या अभिनेता क्या अफसर हो या साधू जी
पग धरते ही जेल के अन्दर सब के सब बीमार हुए

 

कैसा दौर चला है यारों गंदी हो गयी राजनीती अब
अमन चैन से रहने बाले दंगे से दो चार हुए

 

दादी को नहीं दबा मिली और मुन्ने का भी दूध खत्म
कर्फ्यू में मौका परस्त को लाखों के ब्यापार हुए

 

तिल का ताड़ बना डाला क्यों आज सियासतदारों ने
आज बापू तेरे देश में, कैसे -कैसे अत्याचार हुए


हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई
ख्बाजा साईं के घर में , ये बातें क्यों बेकार हुए




ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना