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बुधवार, 14 सितंबर 2016

ग़ज़ल ( सच्ची बात किसको आज सुनना अच्छी लगती है)





कभी अपनों से अनबन है कभी गैरों से अपनापन
दिखाए कैसे कैसे रँग मुझे अब आज जीबन है

ना रिश्तों की ही कीमत है ना नातें अहमियत रखतें
रिश्तें हैं उसी से आज जिससे मिल सके धन है

सियासत में नहीं  युबा , बुढ़ापा काम पा जाता
समय ये आ गया कैसा दिल में आज उलझन है

सच्ची बात किसको आज सुनना अच्छी लगती है
सच्ची  बात सुनने को ब्याकुल ये  हुआ मन है

जीबन के सफ़र में जो मुसीबत में भी अपना हो
"मदन " साँसें जिंदगी अपनी उसका ही तो दर्पण है 



ग़ज़ल ( सच्ची बात किसको आज सुनना अच्छी लगती है)
मदन मोहन सक्सेना

रविवार, 7 अगस्त 2016

ग़ज़ल (रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है )





  



मुसीबत यार अच्छी है पता तो यार चलता है 
कैसे कौन कब कितना,  रंग अपना बदलता है 

किसकी कुर्बानी को किसने याद रक्खा है दुनियाँ  में 
जलता तेल और बाती है कहते दीपक जलता है 

मुहब्बत को बयाँ करना किसके यार बश में है 
उसकी यादों का दिया अपने दिल में यार जलता है 

बैसे जीवन के सफर में तो कितने लोग मिलते हैं 
किसी चेहरे पे अपना  दिल  अभी भी तो मचलता है

समय के साथ बहने का मजा कुछ और है यारों 
रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है 
 
मुसीबत "मदन " अच्छी है पता तो यार चलता है 
कैसे कौन कब कितना,  रंग अपना बदलता है

ग़ज़ल (रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है )

मदन मोहन सक्सेना
















मंगलवार, 19 जुलाई 2016

ग़ज़ल (आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है )





पैसोँ की ललक  देखो दिन कैसे दिखाती है 
उधर माँ बाप तन्हा  हैं इधर बेटा अकेला है 

रुपये पैसोँ की कीमत को वह ही जान सकता है 
बचपन में गरीवी का जिसने दंश झेला  है

अपने थे ,समय भी था ,समय वह और था यारों 
समय पर भी नहीं अपने बस मजबूरी का रेला है 

हर इन्सां की दुनियाँ में इक जैसी कहानी है 
तन्हा रहता है भीतर से बाहर रिश्तों  का मेला है 

समय अच्छा बुरा होता ,नहीं हैं दोष इंसान का 
बहुत मुश्किल है ये कहना  किसने खेल खेला है 

जियो  ऐसे कि हर इक पल ,मानो आख़िरी पल है 
आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है

ग़ज़ल  (आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है )
मदन मोहन सक्सेना

बुधवार, 22 जून 2016

गज़ल (समय ये आ गया कैसा )





गज़ल (समय ये आ गया कैसा )

दीवारें ही दीवारें , नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले हैं

उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं

जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं

जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

मिलता अब समय ना है
, समय ये आ गया कैसा
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं



मदन मोहन सक्सेना

बुधवार, 8 जून 2016

ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )




ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )

सुबह सुबह अफ़रा तफ़री में फ़ास्ट फ़ूड दे देती माँ तुम
टीचर क्या क्या देती ताने , मम्मी तुमको क्या मालूम

क्या क्या रूप बना कर आती ,मम्मी तुम जब लेने आती
लोग कैसे किस्से लगे सुनाने , मम्मी तुमको क्या मालूम

रोज पापा जाते पैसा पाने , मम्मी तुम घर लगी सजाने
पूरी कोशिश से पढ़ते हम , मम्मी तुमको क्या मालूम

घर मंदिर है ,मालूम तुमको पापा को भी मालूम है जब
झगड़े में क्या बच्चे पाएं , मम्मी तुमको क्या मालूम

क्यों इतना प्यार जताती हो , मुझको कमजोर बनाती हो
दूनियाँ बहुत ही जालिम है , मम्मी तुमको क्या मालूम

 


ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )
मदन मोहन सक्सेना

मंगलवार, 10 मई 2016

ग़ज़ल(मुहब्बत)






नजर फ़ेर ली है खफ़ा हो गया हूँ
बिछुड़ कर किसी से जुदा हो गया हूँ
 
मैं किससे करूँ बेबफाई का शिकबा
कि खुद रूठकर बेबफ़ा हो गया हूँ 
 
बहुत उसने चाहा बहुत उसने पूजा
 मुहब्बत का मैं देवता हो गया हूँ 
 
बसायी थी जिसने दिलों में मुहब्बत
उसी के लिए क्यों बुरा हो गया हूँ 
 
मेरा नाम अब क्यों तेरे लब पर भी आये
अब मैं अपना नहीं दूसरा हो गया हूँ 
 
मदन सुनाऊँ किसे अब किस्सा ए गम 
मुहब्बत में मिटकर फना हो गया हूँ . 

ग़ज़ल(मुहब्बत)  

मदन मोहन सक्सेना

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

ग़ज़ल (हर इन्सान की दुनिया में इक जैसी कहानी है )






हर  लम्हा तन्हाई का एहसास मुझको  होता  है
जबकि  दोस्तों के बीच अपनी गुज़री जिंदगानी है

क्यों अपने जिस्म में केवल ,रंगत  खून की दिखती
औरों का लहू बहता , तो सबके लिए पानी है

खुद को भूल जाने की ग़लती सबने कर दी है
हर इन्सान की दुनिया में इक जैसी कहानी है

दौलत के नशे में जो अब दिन को रात कहतें हैं
हर गलती की  कीमत भी, यहीं उनको चुकानी है

मदन ,वक़्त की रफ़्तार का कुछ भी भरोसा  है नहीं
किसको जीत मिल जाये, किसको हार  पानी है

सल्तनत ख्वाबों की मिल जाये तो अपने लिए बेहतर है
दौलत आज है  तो क्या , आखिर कल तो जानी है

ग़ज़ल (हर इन्सान की दुनिया में इक जैसी कहानी है )
मदन मोहन सक्सेना


मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )




हर सुबह  रंगीन   अपनी  शाम  हर  मदहोश है
वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला

चार पल की जिंदगी में ,मिल गयी सदियों की दौलत
जब मिल गयी नजरें हमारी ,दिल से दिल अपना मिला

नाज अपनी जिंदगी पर ,क्यों न हो हमको भला
कई मुद्द्दतों के बाद फिर  अरमानों का पत्ता हिला

इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर
रफ्ता रफ्ता ढह गया, तन्हाई का अपना किला

वक़्त भी कुछ इस तरह से आज अपने साथ है
चाँद सूरज फूल में बस यार का चेहरा मिला

दर्द मिलने पर शिकायत ,क्यों भला करते मदन
 दर्द को देखा जो   दिल में मुस्कराते ही मिला


ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )

मदन मोहन सक्सेना

बुधवार, 23 मार्च 2016

ग़ज़ल (होली )



 ग़ज़ल (होली )

मन से मन भी मिल जाये , तन से तन भी मिल जाये
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

मौसम आज रंगों का छायी अब खुमारी है
चलों सब एक रंग में हो कि आयी आज होली है

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली है

क्या जीजा हों कि साली हों ,देवर हो या भाभी हो
दिखे रंगनें में रंगानें में , सभी मशगूल होली है

ना शिकबा अब रहे कोई , ना ही दुश्मनी पनपे
गले अब मिल भी जाओं सब, आयी आज होली है

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .


ग़ज़ल (होली )

मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 7 मार्च 2016

ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल)







ग़ज़ल (कंक्रीट के जंगल)

कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना
जमीं भी हो गगन भी हो ऐसा घर बनातें हैं

ना ही रोशनी आये ,ना खुशबु ही बिखर पाये
हालत देखकर घर की पक्षी भी लजातें हैं

दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों
पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ बनाते हैं

मिलने का चलन यारों ना जानें कब से गुम अब है
टी बी और नेट से ही समय अपना बिताते हैं

ना दिल में ही जगह यारों ना घर में ही जगह यारों
भूले से भी मेहमाँ को नहीं घर में टिकाते हैं

अब सन्नाटे के घेरे में ,जरुरत भर ही आबाजें
घर में ,दिल की बात दिल में ही यारों अब दबातें हैं


मदन मोहन सक्सेना