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गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

ग़ज़ल ( जिंदगी जिंदगी)







 ग़ज़ल ( जिंदगी जिंदगी)

तुझे पा लिया है जग पा लिया है 
अब दिल में समाने लगी जिंदगी है 

कभी गर्दिशों की कहानी लगी थी 
मगर आज भाने लगी जिंदगी है 

समय कैसे जाता समझ मैं ना पाता 
अब समय को चुराने लगी जिंदगी है 

कभी ख्बाब में तू हमारे थी आती 
अब सपने सजाने लगी जिंदगी है 

तेरे प्यार का ये असर हो गया है 
अब मिलने मिलाने लगी जिंदगी है 

मैं खुद को भुलाता, तू खुद को भुलाती
अब खुद को भुलाने लगी जिंदगी है 



ग़ज़ल ( जिंदगी जिंदगी)
मदन मोहन सक्सेना













गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

ग़ज़ल ( दिल में दर्द जगाता क्यों हैं )




 

गर दबा नहीं है दर्द की तुझ पे 
दिल में दर्द जगाता क्यों हैं 

जो बीच सफर में साथ छोड़ दे 
उन अपनों से मिलबाता क्यों हैं 

क्यों भूखा नंगा ब्याकुल बचपन
पत्थर भर पेट खाता क्यों हैं 

अपने ,सपने कब सच होते 
तन्हाई में डर जाता क्यों हैं 

चुप रह कर सब जुल्म सह रहे 
अपनी बारी पर चिल्लाता क्यों हैं 



ग़ज़ल ( दिल में दर्द जगाता क्यों हैं )


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना