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सोमवार, 23 नवंबर 2015

ग़ज़ल (वक़्त की रफ़्तार)


ग़ज़ल (वक़्त की रफ़्तार)
 
वक़्त की रफ़्तार का कुछ भी भरोसा है नहीं
कल तलक था जो सुहाना कल वही  विकराल हो

इस तरह से आज पग में फूल से कांटे चुभे हैं
चाँदनी  से खौफ लगता ज्यों कालिमा का जाल हो

ये किसी की बदनसीबी गर नहीं तो और क्या है
याद आने पर  किसी का हाल जब बदहाल हो

जो पास रहकर दूर हैं  और दूर रहकर पास हैं
करते  गुजारिश हैं खुदा से,  मौत अब तत्काल हो

चंद लम्हों की धरोहर आज अपने पास है बस
ब्यर्थ से लगते मदन अब मास हो या साल हो


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)






ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)

बदलते बक्त में मुझको दिखे बदले हुए चेहरे
माँ का एक सा चेहरा , मेरे मन में पसर जाता

नहीं देखा खुदा को है ना ईश्वर से मिला मैं हुँ
मुझे माँ के ही चेहरे मेँ खुदा यारों नजर आता

मुश्किल से निकल आता, करता याद जब माँ को
माँ कितनी दूर हो फ़िर भी दुआओं में असर आता

उम्र गुजरी ,जहाँ देखा, लिया है स्वाद बहुतेरा
माँ के हाथ का खाना ही मेरे मन में उतर पाता

खुदा तो आ नहीं सकता ,हर एक के तो बचपन में
माँ की पूज ममता से अपना जीबन , ये संभर जाता

जो माँ की कद्र ना करते ,नहीं अहसास उनको है
क्या खोया है जीबन में, समय उनका ठहर जाता

ग़ज़ल (माँ का एक सा चेहरा)
 

मदन मोहन सक्सेना