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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल (खेल देखिये)





ग़ज़ल (खेल देखिये)



साम्प्रदायिक कहकर जिससे  दूर दूर रहते थे 
राजनीती में कोई  अछूत नहीं ,ये खेल देखिये 

दूध मंहगा प्याज मंहगा और जीना मंहगा हो गया 
छोड़ दो गाड़ी से जाना ,मँहगा अब तेल देखिये

कल तलक थे साथ जिसके, आज उससे दूर हैं 
सेक्युलर कम्युनल का ऐसा घालमेल देखिये 

हो गए कैसे चलन अब आजकल गुरूओं  के यार 
मिलते नहीं बह आश्रम में ,अब  जेल देखिये

बात करते हैं सभी क्यों आज कल जनता की लोग 
देखना है गर उन्हें ,साधारण दर्जें की रेल देखिये 


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल ( खुदा का रूप )







ग़ज़ल ( खुदा का रूप )

गर कोई हमसे कहे की रूप कैसा है खुदा का
हम यकीकन ये कहेंगे  जिस तरह से यार है

संग गुजरे कुछ लम्हों की हो नहीं सकती है कीमत
गर तनहा होकर जीए तो बर्ष सौ  बेकार हैं 

सोचते है जब कभी हम  क्या मिला क्या खो गया 
दिल जिगर साँसें  है अपनी  पर न कुछ अधिकार है

याद कर सूरत सलोनी खुश हुआ करते हैं  हम 
प्यार से बह  दर्द दे दें  तो हमें  स्वीकार है 

जिस जगह पर पग धरा है उस जगह  खुशबु मिली है 
नाम लेने से ही अपनी जिंदगी गुलजार है 

ये ख्बाहिश अपने दिल की है की कुछ नहीं अपना रहे 
क्या मदन इसको ही कहते लोग अक्सर प्यार हैं

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल ( सच्चा झूठा)

 






ग़ज़ल ( सच्चा झूठा)

क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में

एक जमी वख्शी   थी कुदरत ने हमको यारो लेकिन
हमने सब कुछ बाट दिया मेरे में और तेरे में 

आज नजर आती मायूसी मानबता के चहेरे पर  
अपराधी को शरण मिली है आज पुलिस के डेरे में

बीरो की क़ुरबानी का कुछ भी असर नहीं दीखता है
जिसे देखिये चला रहा है सारे तीर अँधेरे में

जीवन बदला भाषा बदली सब कुछ अपना बदल गया है
अनजानापन लगता है अब खुद के आज बसेरे में
 
ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल (मन करता है)

ग़ज़ल(मन करता है)


लल्लू पंजू पप्पू फेंकू रबड़ी को अब देख देख कर
अब मेरा  भी राजनीती में  मन आने को करता है

सच्ची बातें खरी खरी अब किसको अच्छी लगती हैं
चिकनी चिपुडी बातों से मन बहलाने को करता है

रुखा  सूखा गन्दा पानी पीकर कैसे रह लेते थे
इफ्तार में मुर्गा ,बिरयानी मन खाने को  करता है

हिन्दू जाता मंदिर में और मुस्लिम जाता मस्जिद में
मुझको बोट जहाँ पर मिल जाए, मन जाने को  करता है

मेरी मर्जी मेरी इच्छा जैसा चाहूँ  बैसा कर दूँ
जो बिरोध में आये उसको, मन निपटाने को  करता है

ग़ज़ल प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना


बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल( ऐतबार)




ग़ज़ल( ऐतबार)

जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श  बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से

नफरत से की गयी चोट से हर जखम हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

प्यार के एहसास  से जब जब रहे हम बेखबर
तब तब लगा हमको की हम जी रहे बेकार से

इजहार राजे दिल का बह  जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से

जब प्यार से इनकार  हो तो इकरार से है बो भला
मजा पाने लगा है अब ये मदन इकरार का इंकार से


ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना