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रविवार, 7 अगस्त 2016

ग़ज़ल (रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है )





  



मुसीबत यार अच्छी है पता तो यार चलता है 
कैसे कौन कब कितना,  रंग अपना बदलता है 

किसकी कुर्बानी को किसने याद रक्खा है दुनियाँ  में 
जलता तेल और बाती है कहते दीपक जलता है 

मुहब्बत को बयाँ करना किसके यार बश में है 
उसकी यादों का दिया अपने दिल में यार जलता है 

बैसे जीवन के सफर में तो कितने लोग मिलते हैं 
किसी चेहरे पे अपना  दिल  अभी भी तो मचलता है

समय के साथ बहने का मजा कुछ और है यारों 
रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है 
 
मुसीबत "मदन " अच्छी है पता तो यार चलता है 
कैसे कौन कब कितना,  रंग अपना बदलता है

ग़ज़ल (रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है )

मदन मोहन सक्सेना
















2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कलमंगलवार (09-08-2016) को "फलवाला वृक्ष ही झुकता है" (चर्चा अंक-2429) पर भी होगी।
    --
    मित्रतादिवस और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत बढिया। मुसीबत में ही लोगों की पहचान होती है।

    उत्तर देंहटाएं