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शनिवार, 13 जुलाई 2013

ग़ज़ल (मौका )




ग़ज़ल (मौका )

मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों 
मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है .


किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे 
जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है  ..

चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है ...


किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम 
 जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है ....

दिल भी यार पागल है ना जाने दीन दुनिया को 
किसी पत्थर की मूरत पर अक्सर मचल जाता है .....

क्या बताएं आपको हम अपने दिल की दास्ताँ 
जितना दर्द मिलता है ये उतना संभल जाता है ......






ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना  

1 टिप्पणी:

  1. क्या बताएं आपको हम अपने दिल की दास्ताँ
    जितना दर्द मिलता है ये उतना संभल जाता है ......

    दर्द शक्ति भी देता है... सहृदय भी बनता है!
    सुन्दर कथ्य!

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