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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

गज़ल ( अहसास)







गज़ल ( अहसास)

ऐसे कुछ अहसास होते हैं हर इंसान के जीवन में 
भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं 

जो दिल कि बात सुनता है बही दिलदार है यारों 
दौलत बान अक्सर तो असल में दास होते हैं 

अपनापन लगे जिससे बही तो यार अपना है 
आजकल  तो स्वार्थ सिद्धि में रिश्ते नाश होते हैं

धर्म अब आज रुपया है ,कर्मअब आज रुपया है
जीवन केखजानें अब,  क्यों सत्यानाश होते हैं 

समय रहते अगर चेते तभी तो बात बनती है
बरना नरक है जीबन , पीढ़ियों में त्रास होते हैं



गज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना




6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-0122016) को "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल बहाल करें " (चर्चा अंक-2258) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए … स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !
      मदन मोहन सक्सेना

      https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए … स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !
      मदन मोहन सक्सेना

      https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

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  3. सत्य को आइना दिखाती हुई आप की सुंदर रचना .

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    1. आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए … स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !
      मदन मोहन सक्सेना

      https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

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