Google+ Followers

बुधवार, 27 जनवरी 2016

ग़ज़ल (अजब गजब सँसार )


अब जीना दुश्बार हुआ 
अज़ब गज़ब सँसार हुआ

रिश्तें नातें प्यार बफ़ा से 
सबको अब इन्कार  हुआ 

बंगला ,गाड़ी ,बैंक तिजोरी 
इनसे सबको प्यार हुआ 

जिनकी ज़िम्मेदारी घर की
वह सात समुन्द्र पार हुआ 

इक घर में दस दस घर देखें 
अज़ब गज़ब सँसार हुआ

मिलने की है आशा  जिससे
उस से  सब को प्यार हुआ 

ब्यस्त  हुए तव  बेटे बेटी
मदन "बूढ़ा  " जब वीमार हुआ 


ग़ज़ल (अजब गजब सँसार )

मदन मोहन सक्सेना

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28 - 01 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा -2235 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए … स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !
      मदन मोहन सक्सेना

      https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

      हटाएं
  2. सुन्दर और भावपूर्ण कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए … स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !
    मदन मोहन सक्सेना

    https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

    उत्तर देंहटाएं